शैतान को देखा था घर बनाते हुए,
एक बच्चा देखा हर ग्रन्थ जलाते हुए।
मकानों में जा जा चिराग़ बुझाते हुए
वो ही था हाथ में तस्बीह घुमाते हुए।
मेरे मन में है क़ैद वो तस्वीर आज भी,
देखा एक मेमार को शहर ढहाते हुए।
बुतों पे तबसे है यकीन कम हो गया
दीया रो दिया जब रोशनी चुराते हुए।
घरों से सुकून अब खो गया है कहीं,
देखा था इंसाँ को ख़ुदा बनाते हुए।
-'शुभी'
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